गुरुवार, 26 जनवरी 2012

विकास का मॉडल बिहार के लोगों के हित में नहीं

  • बिहार शोध संवाद में कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समीक्षा
  • मुजफ्फरपुर में बिहार के सोलह जिलों के जुटे सामाजिक कार्यकर्ता
मुजफ्फरपुर : लम्बे अंतराल के बाद रविवार को बीआरए बिहार विश्वविद्यालय
का सामुदायिक भवन सार्थक शोध संवाद का साक्षी बना। सूबे के सोलह जिलों से आए करीब दो सौ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बिहार के विकास के लिए चलाई जा रही विकास योजनाओं और सरकार की नीतियों की समीक्षा की। इस दौरान एक स्वर गूंजा की बिहार में विकास के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले दिनों में कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो जायेगी। सो, जनसंवाद से सामने आए विमर्शों से राज्‍य सरकार को अवगत कराया जाए। एक्टिविस्ट अनिल प्रकाश ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि विश्‍व बैंक, अंतरराष्‍ट्रीय मुद्राकोष तथा उन्‍हें नियंत्रित करने वाले अमेरिका तथा अन्‍य साम्राज्‍यवादी देशों की सरकारों के दबाव में चलाई जा रही आर्थिक नीतियों के कारण देश में विषमता, कुपोषण, भूखमरी और बेरोजगारी निरंतर बढ़ रही है। दुर्भाग्‍य से बिहार में भी वहीं नव उदारवादी नीतियां चलाई जा रही हैं। इसका परिणाम है कि कृषि क्षेत्र की हालत खराब है। मनरेगा, इंदिरा आवास जैसी ल्‍याणकारी योजनाएं भी भ्रष्‍टाचार और दलाली की भेंट चढ़ रही हैं। सड़कें बनने के एक से तीन साल के भीतर ही टूट जाती हैं। बड़े कारखाने लग नहीं पा रहे हैं और कृषि आधारित कुटिर उद्योगों को बढ़ावा देने के बजाय उन्‍हें हतोत्‍साहित करने वाले कानून आज भी मौजूद हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि विकास की जमीनी हकीकत का शोधपरक मूल्‍यांकन हो। इस नजरिए से बिहार शोध अभियान की शुरुआत लगभग डेढ़ माह पहले पटना में की गई। इसका यह मुजफ्फरपुर में दूसरा पड़ाव है।
बिहार शोध संवाद के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र की
अध्यक्षता करते हुए हिन्‍दुस्‍तान के पूर्व संपादक सुकांत ने कहा कि कोई
भी सत्ता चलती है तो उसके पीछे कुछ नीतियां होती हैं। यह किसका और किसके लिए हो। यह विमर्श का विषय है। सत्ता के खेल को समझना जरूरी हो गया है। इसे समझेंगे तो पाएंगे कि पूरी की पूरी जनतांत्रिक नीति व नियम पूंजीवादी संस्कारों से प्रेरित है। नीतियां भारत के लिए नहीं 'इंडिया' के लिए बनाई गई हैं। कृषि में किस तरह का विकास हो रहा है। श्रम व पूंजी हमारा है, पर मुनाफा अमेरिकी कंपनियां कमा रही हैं। सरकारी आंकड़ें सत्ता का पाखंड है। इसे तोडऩा होगा। तभी समुचित विकास की सही परिभाषा फलीभूत होगी।
शोध संवाद को संबोधित करते वक्ता. साथ में अनिल प्रकाश, अर्थशास्त्री प्रो. इश्वरी प्रसाद,
दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व संपादक सुकांत, आरटीआई कार्यकर्त्ता शिवप्रकाश
राय, मंजुश्री व् अन्य.
जेएनयू के प्रोफेसर रहे अर्थशास्त्री प्रो. ईश्वरी प्रसाद ने बिहार सरकार के कृषि रोडमैप पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि इससे कृषि उत्पादकता तो बढ़ेगी, लेकिन किसान नहीं बढ़ेंगे। देश में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। 15 साल में दो लाख पैंसठ हजार किसानों ने आत्महत्या की। अब भी प्रति 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। खेती बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सौंप दी गई है। खेती का मॉडर्नाइजेशन किया जा रहा है। यही स्थिति बिहार में भी आने वाली है। अभी यहां आत्महत्या की घटनाएं नहीं हो रही है, लेकिन पूंजी का मॉडर्नाइजेशन हुआ तो अगले साल से स्थिति बदल सकती है। विकास के नाम पर गांवों में सड़क बनाने की बात कही जा रही है। यह कृषि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि कंपनियों के माल बिक्री की सुविधा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है।
बक्सर से आए आरटीआइ एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय ने सूचना का अधिकार को महत्वपूर्ण हथियार बताते हुए इसका उपयोग भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए करने की अपील की। उन्‍होंने कहा कि बिहार में सूचना का अधिकार कानून का बुरा हाल है। सही समय पर सूचनाएं नहीं दी जाती हैं। इतना ही नहीं सूचना मांगने वालों की हत्‍याएं भी हो रही हैं। पत्रकार कुलभूषण ने कहा कि विकास बस आंकड़ों का खेल रह गया है। कुछ लोग गलत आंकड़े पेश कर जनता को गुमराह कर रहे हैं। ऐसे में सार्थक शोध कर सरकारी आंकड़ों की पोल खोलने की पहल होनी चाहिए। मधुबनी से आए मुसहर विकास मंच के संयोजक अशर्फी सदा ने कहा कि अब आरक्षण का लाभ कुछ लोगों तक सिमट कर गया है। यह दुख की बात है। उन्‍होंने कहा कि मुसहर सिर्फ कृषि पर निर्भर रहने वाला समुदाय है। पर सूबे में इसकी
स्थिति बेहद खराब है। इनके लिए कोई ठोस पहल नहीं हो रही है।
किसान नेता वीरेन्द्र राय ने कहा कि सरकार योजनाबद्ध तरीके से कृषि और
किसानों को विदशी कंपनियों के हवाले करने की साजिश में जुटी है।
उन्‍होंने कहा कि जब सभी उत्‍पादों की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं तो
कार्यक्रम को संबोधित करते अर्थशास्त्री प्रो. इश्वरी प्रसाद. साथ में सुकांतजी व अन्य.
किसानों को यह अधिकार क्‍यों नहीं मिल रहा है। उन्‍होंने कृषि उत्पादों की कीमत कृषकों को तय करने के अधिकार की वकालत की।
लोक कलाकारों के जनसंगठन गांव जवार के स्वाधीन दास, पूर्व प्राचार्य
रामएकबाल शर्मा व भानू भाई ने कहा कि सूबे का समुचित विकास तभी संभव है जब सांस्‍कृतिक विकास भी होगा लेकिन सरकार के पास कोई योजना नहीं है। कलाकारों की एक बड़ी बिरादरी हाशिये पर है। ऐसे में लोक कलाओं व लोक कलाकारों के संरक्षण के लिए न सिर्फ नीति बल्कि एक आयोग का भी गठन होना चाहिए।
भागलपुर से आए सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश जी ने कहा कि सूबे में विदेशी कंपनियों के बीज बेचने के लिए बड़े पैमाने पर साजिश चल रही है। गैर कानूनी तरीके से खेतों में प्रयोग हो रहा है। इससे हर साल किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। वहीं सूबे के कृषि विश्‍वविद्यालयों के प्रमाणित देशी बीजों की उपेक्षा की जा रही है। जबकि विदेशी बीज कई तरह से घातक हैं।
गंगा मुक्ति आंदोलन के गौतम ने नदियों को प्रदूषण से निजात दिलाने का
मुद्दा उठाया। बगहा से आए थारू महासभा के शैलेन्द्र ने वनाधिकार और आदिवासियों के मुद्दे को शिद्दत से उठाया।
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए मुंगेर से आए सच्चिदानंद सिंह ने कहा कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियां खतरनाक होती जा रही
हैं। इसके खिलाफ हर जिले में जनसंगठनों की गोलबंदी व आंदोलन जरूरी है।
शोध संवाद संचालन गांव जवार के संयोजक एम. अखलाक ने किया। इससे पूर्व गांव जवार के लोक कलाकारों ने माटी से जुड़े कई गीत प्रस्तुत किए। इस मौके पर प्रभात खबर के स्‍थानीय संपादक शैलेन्द्र भी मौजूद थे।

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रपट - एम. अखलाक

1 टिप्पणी:

  1. मुझे यह कोशिश बहुत अच्छी लगी. अगे भी करते रहने कि जरुरत है. इस काम के साथ मै भी हूं.

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